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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  1.175.34 
स सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तम:।
अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षण:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने तपस्वी नेत्रों से उस भोजन को देखा और क्रोध से भरी हुई आँखों से कहा, 'यह खाने योग्य नहीं है।'
 
Then that great Brahmin looked at the food with his tapasya-sounding eyes and said, 'This is not worth eating' with his eyes filled with anger,
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)