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mahabharat 1.175.18: तब विश्वामित्रजी ने भी अपने को अदृश्य करके अपनी प्रसन्नता की इच्छा से राजा और शक्ति दोनों को छल से छला ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 175: शक्तिके शापसे कल्माषपादका राक्षस होना, विश्वामित्रकी प्रेरणासे राक्षसद्वारा वसिष्ठके पुत्रोंका भक्षण और वसिष्ठका शोक  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.175.18 
अन्तर्धाय तदाऽऽत्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत।
तावुभावतिचक्राम चिकीर्षन्नात्मन: प्रियम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
तब विश्वामित्रजी ने भी अपने को अदृश्य करके अपनी प्रसन्नता की इच्छा से राजा और शक्ति दोनों को छल से छला ॥18॥
 
India Then Vishwamitraji also tricked both the king and Shakti by making himself invisible and wishing to please himself. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)