श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 174: वसिष्ठजीके अद्‍भुत क्षमा-बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव  »  श्लोक 10-12
 
 
श्लोक  1.174.10-12 
ग्राम्यारण्याश्चौषधीश्च दुदुहे पय एव च।
षड्रसं चामृतनिभं रसायनमनुत्तमम्॥ १०॥
भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च।
लेह्यान्यमृतकल्पानि चोष्याणि च तथार्जुन॥ ११॥
रत्नानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च।
तै: कामै: सर्वसम्पूर्णै: पूजितश्च महीपति:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उस कामधेनु ने ग्रामीण तथा वन्य अन्न, फल-मूल, दूध, षट् रसयुक्त अन्न, अमृत के समान मधुर उत्तम रसायन, नाना प्रकार के खाए, पिए तथा चबाए जाने वाले पदार्थ, अमृत के समान स्वादिष्ट चटनियाँ, चूसने योग्य गन्ने, नाना प्रकार के बहुमूल्य रत्न तथा वस्त्र आदि सब प्रदान किए। हे अर्जुन! उन सभी इच्छित वस्तुओं से राजा विश्वामित्र का भली-भाँति पूजन किया गया।
 
Rural and wild food, fruits and roots, milk, six-taste food, the best chemical as sweet as nectar, various things that can be eaten, drunk and chewed, chutneys that were as tasty as nectar, sugarcanes that can be sucked, and various kinds of precious gems and clothes, etc. were all presented by that Kamadhenu. O Arjuna, King Visvamitra was thoroughly worshipped with all those desired things. 10-12.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)