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mahabharat 1.172.44: प्रजा की ऐसी दुर्दशा देखकर धर्मात्मा और बुद्धिमान् ऋषि भगवान वशिष्ठ ने (अपने तप के बल से) उस राज्य पर वर्षा की॥44॥   |   mahabharat अध्याय 1.172: वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 172: वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  1.172.44 
ततस्तत् तादृशं दृष्ट्वा स एव भगवानृषि:।
अभ्यवर्षत धर्मात्मा वसिष्ठो मुनिसत्तम:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
प्रजा की ऐसी दुर्दशा देखकर धर्मात्मा और बुद्धिमान् ऋषि भगवान वशिष्ठ ने (अपने तप के बल से) उस राज्य पर वर्षा की॥44॥
 
Seeing such plight of the people, Lord Vashishtha, the virtuous and wise sage, showered rain on that kingdom (with the power of his penance). 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)