अध्याय 172: वसिष्ठजीकी सहायतासे राजा संवरणको तपतीकी प्राप्ति
श्लोक 1: गन्धर्व बोला, "अर्जुन! ऐसा कहकर वह सुन्दर और तेजस्वी स्त्री तुरन्त ऊपर (आकाश में) चली गई और राजा संवरण पुनः पृथ्वी पर (बेहोश होकर) गिर पड़ा।"
श्लोक 2: इतने में ही उसका मंत्री अपनी सेना और अनुयायियों के साथ उस महान राजा की खोज में आ रहा था। उस महान वन में पहुँचकर मंत्री ने राजा को देखा॥2॥
श्लोक 3-4: वे समय पर गिरे हुए ऊँचे इन्द्रध्वज के समान भूमि पर पड़े थे। उन महाधनुर्धर महाराज को ताप से मुक्त होकर इस प्रकार भूमि पर लेटे देखकर राजमंत्री इतना व्याकुल हो गया मानो उसके शरीर में आग लग गई हो। वह तुरन्त उनके पास गया। स्नेह के कारण उसके हृदय में घबराहट उत्पन्न हो गई थी ॥3-4॥
श्लोक 5-6: राजमंत्री न केवल आयु में बहुत वृद्ध थे, अपितु उनमें महान् बुद्धि, यश और नीति भी थी। जैसे एक पिता अपने गिरे हुए पुत्र को भूमि से उठा लेता है, उसी प्रकार उन्होंने कामपीड़ा से मूर्छित भूमिपालों के स्वामी महाराज संवरण को शीघ्रता से उठा लिया। राजा को उठाकर जीवित पाकर उनकी चिंता दूर हो गई।
श्लोक 7: वह खड़ा हुआ और बैठे हुए महाराज से मधुर मंगलमय वाणी में बोला - 'पुरुषोत्तम! डरो मत। अनघ! तुम्हारा कल्याण हो।'
श्लोक 8: युद्ध में शत्रु सेना का संहार करने वाले राजा को भूमि पर गिरा हुआ देखकर मंत्री ने यह मान लिया कि वे भूख-प्यास से पीड़ित हैं और थक गए हैं ॥8॥
श्लोक 9: राजा का मुकुट गिरने पर भी नहीं टूटा (इससे यह संकेत मिलता था कि युद्ध में राजा को कोई चोट नहीं आई थी)। मंत्री ने राजा के सिर पर कमल की सुगंध मिला ठंडा जल छिड़का।
श्लोक 10: इससे राजा सतर्क हो गया। शक्तिशाली राजा ने अपने एकमात्र मंत्री को छोड़कर अपनी पूरी सेना वापस भेज दी।
श्लोक 11: राजा की आज्ञा पाकर वह विशाल सेना तुरन्त राजधानी की ओर चल पड़ी; किन्तु राजा संवरण पुनः उसी पर्वत की चोटी पर जाकर बैठ गया।
श्लोक 12: तत्पश्चात् उस महान पर्वत पर स्नान करके वह भगवान सूर्य की आराधना करने के लिए हाथ जोड़कर तथा ऊपर की ओर मुख करके भूमि पर खड़ा हो गया॥12॥
श्लोक 13: उस समय शत्रुओं का नाश करने वाले राजा संवरण ने मन ही मन अपने पुरोहित वसिष्ठ ऋषि का स्मरण किया।
श्लोक 14: वे दिन-रात एक ही स्थान पर खड़े होकर ध्यान में लगे रहते थे। तब बारहवें दिन महर्षि वसिष्ठ वहाँ आ पहुँचे॥14॥
श्लोक 15: शुद्ध हृदय वाले महर्षि वशिष्ठ ने दिव्य ज्ञान से पहले ही जान लिया था कि सूर्यकन्या तपती ने राजा का मन चुरा लिया है ॥15॥
श्लोक 16: इस प्रकार मन और इन्द्रियों को वश में रखकर तपस्या में लगे हुए पुण्यात्मा वशिष्ठ ऋषि ने राजा से अपने कार्य की सिद्धि के लिए बात की ॥16॥
श्लोक 17: उक्त महाराज की बात मानकर सूर्य के समान तेजस्वी भगवान वशिष्ठ मुनि सूर्यदेव से मिलने के लिए ऊपर गए॥17॥
श्लोक 18: ऋषि वशिष्ठ हाथ जोड़कर सहस्त्र किरणों से सुशोभित सूर्यदेव के पास गए और 'मैं वशिष्ठ हूँ' कहकर अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक अपना समाचार सुनाया।
श्लोक d1-d3: तब वशिष्ठजी बोले - जो अजन्मा हैं, तीनों लोकों को पवित्र करने वाले हैं, समस्त प्राणियों के अंतःकरण के स्वामी हैं, किरणों के अधिपति हैं, धर्म के स्वरूप हैं, सृष्टि और संहार के अधिष्ठाता हैं तथा परम दयालु देवताओं में श्रेष्ठ हैं, उन भगवान सूर्य को नमस्कार है। जो ज्ञानियों के अंतर्यामी, जगत के प्रकाशक, जगत के हितैषी, स्वयंभू और सहस्रों तेजयुक्त नेत्रों से सुशोभित हैं, उन अनंत तेजस्वी और सुंदर भगवान सूर्य को नमस्कार है। जो जगत के एकमात्र नेत्र हैं, जो जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार के लिए उत्तरदायी हैं, जिनके स्वरूप ही तीनों वेद हैं, जो त्रिगुण रूप धारण करके ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाम से विख्यात हैं, उन भगवान सविता को नमस्कार है।
श्लोक 19: तब परम तेजस्वी भगवान सूर्य ने वशिष्ठ मुनि से कहा - 'महर्षि! आपका स्वागत है! आपकी जो भी इच्छा हो, कहिए।'
श्लोक 20: हे वक्ताओं में श्रेष्ठ वक्ता! आप मुझसे जो भी चाहें, चाहे वह इच्छित वस्तु कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो, मैं आपको अवश्य दूँगा।
श्लोक d4: 'हे उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षि! आपने मेरे लिए जो स्तुति की है, उसके लिए मैं आपको वर देने को तैयार हूँ, आप कोई भी वर माँग लीजिए। आपके द्वारा कही गई स्तुति भक्तों द्वारा निरंतर जपने योग्य है। मैं आपको वर देना चाहता हूँ।'
श्लोक 21: उनके ऐसा कहने पर महातपस्वी ऋषि वसिष्ठ मरीचि-माली ने भगवान भास्कर को प्रणाम किया और इस प्रकार बोले ॥21॥
श्लोक 22: वसिष्ठ बोले, 'हे विभावसो! आपकी यह तपती नाम की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन है, मैं इसे आपसे राजा बनाने के लिए माँगता हूँ।'
श्लोक 23: उस राजा की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई है। वह धर्म और अर्थ का ज्ञाता और उदार बुद्धि वाला है; इसलिए हे आकाश में विचरण करने वाले सूर्यदेव! महाराज संवरण आपकी पुत्री के लिए उपयुक्त वर होंगे॥ 23॥
श्लोक 24: वसिष्ठजी के ऐसा कहने पर भगवान सूर्य ने अपनी कन्या देने का निश्चय करके ब्रह्मर्षिक को नमस्कार करके इस प्रकार कहा -॥24॥
श्लोक 25: 'मुनि! संवरण राजाओं में श्रेष्ठ है, आप मुनियों में श्रेष्ठ हैं और आप तपस्वियों में श्रेष्ठ हैं; अतः उनके दान से बढ़कर और क्या दान हो सकता है?'॥25॥
श्लोक 26: इसके बाद भगवान सूर्य ने साक्षात् अनिंद्य सुंदरी तपती को महात्मा वशिष्ठ को राजा संवरण की पत्नी बनने का प्रस्ताव दिया। 26॥
श्लोक 27-28: वसिष्ठ ऋषि ने उस कन्या को स्वीकार कर लिया और वहाँ से विदा लेकर वे तपती के साथ पुनः उस स्थान पर आये, जहाँ कुरुवंश में श्रेष्ठ यशस्वी राजा संवरण काम के वशीभूत होकर मन में तपती का चिन्तन करते हुए बैठे थे।
श्लोक 29: वसिष्ठजी के साथ सुन्दर मुस्कुराती हुई देवी तपती को आते देख राजा संवरण बहुत प्रसन्न हुए और अधिक सुन्दर दिखने लगे ॥29॥
श्लोक 30: वह सुन्दर भौंहों वाली कन्या गर्म आकाश से पृथ्वी पर गिरते समय और भी अधिक सुन्दर लग रही थी, तथा अपनी विद्युत् प्रभा से समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी।
श्लोक 31: राजा ने कष्ट सहन करते हुए बारह रातों तक पूर्ण एकाग्रता से ध्यान किया। तब शुद्ध हृदय वाले ऋषि वशिष्ठ राजा के पास आए।
श्लोक 32: महाराज संवरण ने तप द्वारा समस्त वर देने वाले भगवान सूर्य को प्रसन्न करके वशिष्ठजी के तेज से तपती को पत्नी रूप में प्राप्त किया ॥32॥
श्लोक 33: तत्पश्चात् देवताओं और गन्धर्वों से सेवित होकर उन श्रेष्ठ पुरुषों ने उस सुन्दर पर्वत पर विधिपूर्वक पवित्र जल का सेवन किया॥33॥
श्लोक 34: तत्पश्चात् वशिष्ठ की अनुमति लेकर राजा संवरण ने अपनी पत्नी के साथ उसी पर्वत पर समय बिताने की इच्छा व्यक्त की।
श्लोक 35: उन दिनों राजा ने अपने मंत्री को नगर, राष्ट्र, वन और उद्यानों की देखभाल और रक्षा करने की आज्ञा देकर विदा कर दिया ॥35॥
श्लोक 36: वसिष्ठ भी राजा से विदा लेकर अपने स्थान पर चले गए और राजा संवरण उस पर्वत पर देवता की भांति रहने लगे।
श्लोक 37: वह अपनी पत्नी के साथ उसी पर्वत के वन-उपवनों में बारह वर्षों तक उसी प्रकार सुख भोगता रहा ॥37॥
श्लोक 38: अर्जुन! उन दिनों महाराज संवरण के राज्य और नगर में इन्द्र ने बारह वर्षों तक वर्षा नहीं की।
श्लोक 39: हे शत्रुसूदन! उस अनावृष्टि के समय में स्थावर और चलायमान सभी प्रकार के मनुष्य नष्ट होने लगे।
श्लोक 40: ऐसे भयंकर समय में ओस की एक बूँद भी धरती पर नहीं गिरी। परिणाम यह हुआ कि फसलें बिल्कुल नहीं उगीं।
श्लोक 41: तब सभी लोग बेचैन हो गए। भूख के डर से लोग अपने घर छोड़कर सभी दिशाओं में भटकने लगे।
श्लोक 42-43: तब उस नगर और राष्ट्र के लोग भूख से व्याकुल होकर सनातन परंपरा को त्यागकर, अपनी स्त्री, बच्चों और परिवारों को त्यागकर एक-दूसरे को मारने और लूटने लगे। राजा का नगर ऐसे लोगों से भर गया जो भूख और उपवास के कारण मृत समान हो रहे थे। उन मानव कंकालों से भरा हुआ वह नगर भूत-प्रेतों से घिरा हुआ यमराज के निवास के समान प्रतीत हो रहा था। 42-43।
श्लोक 44: प्रजा की ऐसी दुर्दशा देखकर धर्मात्मा और बुद्धिमान् ऋषि भगवान वशिष्ठ ने (अपने तप के बल से) उस राज्य पर वर्षा की॥44॥
श्लोक 45: वे तपती के साथ अनेक वर्षों से प्रवास कर रहे श्रेष्ठ पुरुषों को भी नगर में ले आए। उनके आते ही दैत्यों का संहार करने वाले देवराज इन्द्र ने वहाँ पूर्ववत् वर्षा आरम्भ कर दी। 45॥
श्लोक 46: उस महान राजा के नगर में प्रवेश करने पर भगवान इन्द्र ने पुनः वहाँ प्रचुर वर्षा कर दी जिससे अन्न की पैदावार बढ़ गई ॥ 46॥
श्लोक 47: तब से शुद्ध हृदय वाले महाप्रतापी राजा संवरण के द्वारा पालित समस्त प्रजा सुखी रहने लगी। उस राज्य और नगर में महान् आनन्द छा गया ॥47॥
श्लोक 48: तत्पश्चात् महाराज संवरण ने तपती के साथ, शची के साथ इन्द्र के समान सुशोभित होकर बारह वर्षों तक यज्ञ किया।
श्लोक 49: गन्धर्व कहते हैं- कुन्तीनन्दन! इस प्रकार भगवान सूर्य की पुत्री महाभागा तपती आपके पूर्वज संवरण की पत्नी हुई, इसी कारण मैंने आपको तपतीनन्दन माना है॥49॥
श्लोक 50: हे तपस्वियों में श्रेष्ठ अर्जुन! महाराज संवरण ने तपती के गर्भ से कुरु को उत्पन्न किया था, अतः उसी वंश में उत्पन्न होने के कारण तुम सब तपत्य हो गए।
श्लोक d5-d6: भरतश्रेष्ठ, उसी कुरु से उत्पन्न होने के कारण आप सभी 'कौरव' और 'कुरुवंशी' कहलाते हैं। इसी प्रकार, पुरु से उत्पन्न होने के कारण आप 'पौरव', अजमीढ़ कुल में उत्पन्न होने के कारण आप 'अजामीढ़' और भरत कुल में उत्पन्न होने के कारण आप 'भरत' कहलाते हैं। इस प्रकार मैंने आपके वंशज तपती की सम्पूर्ण प्राचीन कथा कह सुनाई। अब आप लोग पुरोहित को आगे रखकर इस पृथ्वी का पालन और उपभोग करें।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥