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mahabharat 1.170.5: मैं तुम्हें वह कारण बताता हूँ कि मैंने अपनी वाणी में इसे 'तपत्य' क्यों कहा है। ध्यानपूर्वक सुनो ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.170.5 
उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद् वच:।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना भव॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मैं तुम्हें वह कारण बताता हूँ कि मैंने अपनी वाणी में इसे 'तपत्य' क्यों कहा है। ध्यानपूर्वक सुनो ॥5॥
 
I am telling you the reason why I have called it 'Tapatya' in my speech. Listen attentively. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)