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mahabharat 1.170.40: 'सुमुखी! जब से मैंने तुम्हारा मुख देखा है, जो चन्द्रमा से भी अधिक सुन्दर है और जिसकी आँखें कमल की पंखुड़ियों के समान हैं, तब से मैं अपने मन को मथ रहा हूँ।'   |   mahabharat अध्याय 1.170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.170.40 
दृष्ट्वैव चारुवदने चन्द्रात् कान्ततरं तव।
वदनं पद्मपत्राक्षं मां मथ्नातीव मन्मथ:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
'सुमुखी! जब से मैंने तुम्हारा मुख देखा है, जो चन्द्रमा से भी अधिक सुन्दर है और जिसकी आँखें कमल की पंखुड़ियों के समान हैं, तब से मैं अपने मन को मथ रहा हूँ।'
 
'Sumukhi! Ever since I saw your face which is more beautiful than the moon and has eyes like the lotus petals, I have been churning my mind.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)