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mahabharat 1.170.38: 'मुझे ऐसा प्रतीत होता है, कि तुम न तो देवांगना हो, न राक्षसी, न यक्ष-कुल की स्त्री हो, न राक्षस-कुल की, न नाग-कन्या हो और न गन्धर्व-कन्या। मैं तो तुम्हें मनुष्य भी नहीं मानता॥38॥   |   mahabharat अध्याय 1.170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  1.170.38 
न देवीं नासुरीं चैव न यक्षीं न च राक्षसीम्।
न च भोगवतीं मन्ये न गन्धर्वीं न मानुषीम्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
'मुझे ऐसा प्रतीत होता है, कि तुम न तो देवांगना हो, न राक्षसी, न यक्ष-कुल की स्त्री हो, न राक्षस-कुल की, न नाग-कन्या हो और न गन्धर्व-कन्या। मैं तो तुम्हें मनुष्य भी नहीं मानता॥38॥
 
'It seems to me, you are neither a Devangana nor a demon girl, neither a Yaksha clan woman nor a Rakshasa clan woman, neither a Naga girl nor a Gandharva girl. I don't even consider you human. 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)