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mahabharat 1.170.3: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उनके ऐसा कहने पर गन्धर्व ने कुन्तीनन्दन धनंजय को वह कथा सुनानी आरम्भ की, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 1.170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.170.3 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त: स गन्धर्व: कुन्तीपुत्रं धनंजयम्।
विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! उनके ऐसा कहने पर गन्धर्व ने कुन्तीनन्दन धनंजय को वह कथा सुनानी आरम्भ की, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध है॥3॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! On his saying this, Gandharva started telling the story to Kuntinandan Dhananjay, which is famous in all the three worlds. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)