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mahabharat 1.170.2: हे मुनि गंधर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हम ताप्त्य कहलाते हैं? मैं स्वयं को कुन्तीपुत्र मानता हूँ। अतः मैं 'ताप्त्य' का वास्तविक रहस्य जानने के लिए अत्यंत उत्सुक हूँ॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 1.170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.170.2 
तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वयम्।
कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
हे मुनि गंधर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हम ताप्त्य कहलाते हैं? मैं स्वयं को कुन्तीपुत्र मानता हूँ। अतः मैं 'ताप्त्य' का वास्तविक रहस्य जानने के लिए अत्यंत उत्सुक हूँ॥ 2॥
 
O saintly Gandharvaraj! Who is this Tapati, because of whom we are called Taapatya? I consider myself to be Kunti's son. Therefore, I am very eager to know the real secret of 'Taapatya'.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)