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mahabharat 1.170.13-14: पौरवनन्दन! वे मन और इन्द्रियों को वश में रखकर, अर्घ्य, पुष्प, गन्ध और नैवेद्य आदि से पवित्र करके तथा नाना प्रकार के नियम, व्रत और तप करके बड़ी भक्तिपूर्वक उदय होते हुए सूर्य की पूजा करते थे। उनके हृदय में सेवा का भाव था। वे शुद्ध और अहंकारशून्य थे। 13-14॥   |   mahabharat अध्याय 1.170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 170: सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  1.170.13-14 
अर्घ्यमाल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियत: शुचि:।
नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि॥ १३॥
शुश्रूषुरनहंवादी शुचि: पौरवनन्दन।
अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
पौरवनन्दन! वे मन और इन्द्रियों को वश में रखकर, अर्घ्य, पुष्प, गन्ध और नैवेद्य आदि से पवित्र करके तथा नाना प्रकार के नियम, व्रत और तप करके बड़ी भक्तिपूर्वक उदय होते हुए सूर्य की पूजा करते थे। उनके हृदय में सेवा का भाव था। वे शुद्ध और अहंकारशून्य थे। 13-14॥
 
Pauravanandan! They kept their mind and senses under control and worshiped the rising sun with great devotion by purifying it with offerings like Arghya, flowers, fragrance and offerings and by following various rules, fasts and penances. There was a feeling of service in his heart. He was pure and egoless. 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)