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mahabharat 1.169.71: ब्रह्मचर्य! ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा गुण है और यह तुममें अवश्य विद्यमान है। हे कुन्तीपुत्र! इसीलिए मैं युद्ध में तुमसे हार गया।   |   mahabharat अध्याय 1.169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  1.169.71 
ब्रह्मचर्यं परो धर्म: स चापि नियतस्त्वयि।
यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मि विजितस्त्वया॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मचर्य! ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा गुण है और यह तुममें अवश्य विद्यमान है। हे कुन्तीपुत्र! इसीलिए मैं युद्ध में तुमसे हार गया।
 
Brahmacharya! Brahmacharya is the greatest virtue and it is definitely present in you. O son of Kunti! That is why I have lost to you in the battle.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)