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mahabharat 1.169.51: तब से देवतागण अनेक भागों में विभक्त वज्र के प्रत्येक भाग की पूजा करते हैं। संसार में जो कुछ भी है, जैसे महान धन और यश आदि, वह सब वज्र का ही रूप माना जाता है ॥ 51॥   |   mahabharat अध्याय 1.169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  1.169.51 
ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते।
लोके यशो धनं किंचित् सैव वज्रतनु: स्मृता॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
तब से देवतागण अनेक भागों में विभक्त वज्र के प्रत्येक भाग की पूजा करते हैं। संसार में जो कुछ भी है, जैसे महान धन और यश आदि, वह सब वज्र का ही रूप माना जाता है ॥ 51॥
 
Since then, the gods worship each part of the Vajra which has been divided into many parts. Whatever is there in the world, such as great wealth and fame, etc., is considered to be a form of Vajra. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)