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mahabharat 1.169.42: जिन्होंने अपने वेग से शत्रु की शक्ति को कुंद करके उसे परास्त कर दिया है और फिर जब शत्रु ने समर्पण कर दिया है, तब जो उसके प्राण बचा रहे हैं, वे किस कल्याण के अधिकारी नहीं हैं? ॥42॥   |   mahabharat अध्याय 1.169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  1.169.42 
संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम्।
यो रिपुं योजयेत् प्राणै: कल्याणं किं न सोऽर्हति॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
जिन्होंने अपने वेग से शत्रु की शक्ति को कुंद करके उसे परास्त कर दिया है और फिर जब शत्रु ने समर्पण कर दिया है, तब जो उसके प्राण बचा रहे हैं, वे किस कल्याण के अधिकारी नहीं हैं? ॥42॥
 
Those who have defeated the enemy by blunting his power with their own speed, and then, when the enemy has surrendered, those who are saving his life, what welfare are they not entitled to? ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)