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mahabharat 1.169.36: युधिष्ठिर बोले- हे शत्रुओं का नाश करने वाले अर्जुन! यह गंधर्व युद्ध हार चुका है और अपना वैभव खो चुका है। अब इसकी पत्नी इसकी रक्षा के लिए आई है। यह स्वयं कोई वीरतापूर्ण कार्य नहीं कर सकता। ऐसे असहाय शत्रु को कौन मारता है? इसे जीवित छोड़ दो।   |   mahabharat अध्याय 1.169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  1.169.36 
युधिष्ठिर उवाच
युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम्।
को निहन्याद् रिपुं तात मुञ्चेमं रिपुसूदन॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले- हे शत्रुओं का नाश करने वाले अर्जुन! यह गंधर्व युद्ध हार चुका है और अपना वैभव खो चुका है। अब इसकी पत्नी इसकी रक्षा के लिए आई है। यह स्वयं कोई वीरतापूर्ण कार्य नहीं कर सकता। ऐसे असहाय शत्रु को कौन मारता है? इसे जीवित छोड़ दो।
 
Yudhishthira said- dear Arjun, the destroyer of enemies! This Gandharva has lost the war and has lost his glory. Now his wife has come to protect him. He himself cannot perform any heroic feat. Who kills such a helpless enemy? Leave him alive.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)