श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता  »  श्लोक 31-33
 
 
श्लोक  1.169.31-33 
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डव: क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह।
प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत्॥ ३१॥
विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महाबल:।
अस्त्रतेज:प्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम्॥ ३२॥
शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनंजय:।
भ्रातॄन् प्रति चकर्षाथ सोऽस्त्रपातादचेतसम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय ! ऐसा कहकर पाण्डु नन्दन अर्जुन ने कुपित होकर गन्धर्व पर प्रज्वलित अग्निअस्त्र चलाया । उस अस्त्र ने गन्धर्व के रथ को जलाकर भस्म कर दिया । वह रथहीन गन्धर्व व्याकुल होकर अस्त्र के तेज से मोहित होकर मुँह के बल गिरने लगा । महाबली अर्जुन ने पुष्पमालाओं से सुशोभित उसके केश पकड़कर उसे घसीटकर अपने भाइयों के पास ले गया । उस अस्त्र के प्रहार से वह गन्धर्व मूर्छित हो गया था ॥31-33॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Saying this, Pandu Nandan Arjun became enraged and fired the flaming fire weapon at Gandharva. That weapon burnt Gandharva's chariot to ashes. That chariot-less Gandharva became distraught and started falling face down, bewildered by the brilliance of the weapon. The mighty Arjun caught hold of her hair decorated with flower garlands and dragged her to his brothers. That Gandharva had become unconscious due to the blow of the weapon. 31-33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)