श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  1.169.26 
उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तरम्।
व्यपोहत शरांस्तस्य सर्वानेव धनंजय:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
यह देखकर पाण्डवपुत्र धनंजय ने तुरन्त अपनी मशाल घुमाकर अपने उत्तम कवच से उसके बाणों को रोककर उन्हें निष्फल कर दिया।
 
Seeing this, Pandava's son Dhananjaya immediately turned his torch and stopped his arrows with his excellent shield and rendered them useless.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)