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mahabharat 1.169.15: ‘मेरे रहते यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता या मनुष्य कोई भी नहीं आ सकता; फिर तुम सब कैसे आ रहे हो?’॥15॥   |   mahabharat अध्याय 1.169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 169: पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.169.15 
न कौणपा: शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषा:।
इदं समुपसर्पन्ति तत् किं समनुसर्पथ॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘मेरे रहते यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता या मनुष्य कोई भी नहीं आ सकता; फिर तुम सब कैसे आ रहे हो?’॥15॥
 
‘In my presence no demons, yakshas, gods or humans can come here; then how are you all coming?’॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)