Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.166.d15-d19: द्रुपद ने कहा—भाइयों! अर्जुन का रूप अद्भुत था। उसका धैर्य अद्भुत था। उसका पराक्रम और शस्त्र विद्या भी असाधारण थी। मैं दिन-रात अर्जुन की चिंता में डूबा रहता हूँ। हाय! वह अपने भाइयों और माता सहित अग्नि में जल गया। संसार में इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है? यह सत्य है कि काल का उल्लंघन करना बड़ा कठिन है। मेरी प्रतिज्ञा झूठी सिद्ध हुई। अब मैं लोगों को क्या बताऊँगा? मैं दिन-रात आन्तरिक शोक से जल रहा हूँ। मैंने निर्दोष याज और उपयाज का आदर किया और उनसे दो संतानें माँगीं। मैंने एक ऐसा पुत्र माँगा जो द्रोणाचार्य का वध कर सके और दूसरी बात मैंने एक ऐसी पुत्री माँगी जो वीर अर्जुन की पत्नी बन सके। मेरा उद्देश्य सभी जानते हैं और महर्षि याज ने भी यही घोषित किया था। उन्होंने पुत्रयेष्टि यज्ञ करके धृष्टद्युम्न और कृष्ण को उत्पन्न किया था। इन दोनों संतानों को पाकर मैं बहुत संतुष्ट हुआ था। अब मुझे क्या करना चाहिए? कुन्ती सहित पाण्डव नष्ट हो गये। | mahabharat अध्याय 1.166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
द्रुपद उवाच
अहो रूपमहो धैर्यमहो वीर्यं च शिक्षितम्।
चिन्तयामि दिवारात्रमर्जुनं प्रति बान्धवा:॥
भ्रातृभि: सहितो मात्रा सोऽदह्यत हुताशने।
किमाश्चर्यमिदं लोके कालो हि दुरतिक्रम:॥
मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यामि साम्प्रतम्।
अन्तर्गतेन दु:खेन दह्यमानो दिवानिशम्।
याजोपयाजौ सत्कृत्य याचितौ तौ मयानघौ॥
भारद्वाजस्य हन्तारं देवीं चाप्यर्जुनस्य वै।
लोकस्तद् वेद यच्चैव तथा याजेन वै श्रुतम्॥
याजेन पुत्रकामीयं हुत्वा चोत्पादितावुभौ।
धृष्टद्युम्नश्च कृष्णा च मम तुष्टिकरावुभौ॥
किं करिष्यामि ते नष्टा: पाण्डवा: पृथया सह।
अनुवाद
द्रुपद ने कहा—भाइयों! अर्जुन का रूप अद्भुत था। उसका धैर्य अद्भुत था। उसका पराक्रम और शस्त्र विद्या भी असाधारण थी। मैं दिन-रात अर्जुन की चिंता में डूबा रहता हूँ। हाय! वह अपने भाइयों और माता सहित अग्नि में जल गया। संसार में इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है? यह सत्य है कि काल का उल्लंघन करना बड़ा कठिन है। मेरी प्रतिज्ञा झूठी सिद्ध हुई। अब मैं लोगों को क्या बताऊँगा? मैं दिन-रात आन्तरिक शोक से जल रहा हूँ। मैंने निर्दोष याज और उपयाज का आदर किया और उनसे दो संतानें माँगीं। मैंने एक ऐसा पुत्र माँगा जो द्रोणाचार्य का वध कर सके और दूसरी बात मैंने एक ऐसी पुत्री माँगी जो वीर अर्जुन की पत्नी बन सके। मेरा उद्देश्य सभी जानते हैं और महर्षि याज ने भी यही घोषित किया था। उन्होंने पुत्रयेष्टि यज्ञ करके धृष्टद्युम्न और कृष्ण को उत्पन्न किया था। इन दोनों संतानों को पाकर मैं बहुत संतुष्ट हुआ था। अब मुझे क्या करना चाहिए? कुन्ती सहित पाण्डव नष्ट हो गये।
Drupada said— Brothers! Arjuna's beauty was amazing. His patience was astonishing. His valour and his training in weapons were also extraordinary. I am lost in worry about Arjuna day and night. Alas! He burned in fire along with his brothers and mother. What can be more surprising than this in the world? It is true that it is very difficult to violate time. My vow has been proved false. Now what will I tell people? I am burning with internal sorrow day and night. I honored the innocent Yaj and Upayaj and requested them for two children. I asked for a son who could kill Dronacharya and secondly I prayed for a daughter who could become the consort of brave Arjuna. Everyone knows my purpose and Maharishi Yaj had also declared the same. He had produced Dhrishtadyumna and Krishna by performing Putrayeshti Yajna. I was very satisfied after getting these two children. What should I do now? The Pandavas including Kunti were destroyed.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥