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mahabharat 1.166.9-12: उन दोनों की शक्ति को समझकर आलस्य से रहित राजा द्रुपद ने उन्हें समस्त इच्छित भोग देने का संकल्प करके आमंत्रित किया। दोनों में से छोटा उपयाज व्रतों का बहुत अच्छा पालन करने वाला था। द्रुपद ने उससे एकान्त में मिलकर उसकी इच्छानुसार समस्त भोग प्रदान किए और उसे अपने अनुकूल करने का प्रयत्न किया। समस्त इच्छित वस्तुएँ देने का संकल्प लेकर द्रुपद मधुर वचन बोलते हुए ऋषि के चरणों की सेवा करने लगे और उनकी विधिपूर्वक पूजा करके उपयाज से बोले - 'विप्रवर उपयाज! आप वह कर्म कीजिए जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो द्रोणाचार्य का वध कर सके। उस कर्म के पूर्ण होने पर मैं आपको एक अर्बुद (दस करोड़) गौएँ दूँगा। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इसके अतिरिक्त जो भी अन्य वस्तु आपके हृदय को सर्वाधिक प्रिय होगी, वह मैं आपको अर्पित करूँगा, इसमें संशय नहीं है।'॥9-12॥   |   mahabharat अध्याय 1.166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति  »  श्लोक 9-12
 
 
श्लोक  1.166.9-12 
स तावामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रित:।
बुद्‍ध्वा बलं तयोस्तत्र कनीयांसमुपह्वरे॥ ९॥
प्रपेदे छन्दयन् कामैरुपयाजं धृतव्रतम्।
पादशुश्रूषणे युक्त: प्रियवाक् सर्वकामद:॥ १०॥
अर्चयित्वा यथान्यायमुपयाजमुवाच स:।
येन मे कर्मणा ब्रह्मन् पुत्र: स्याद् द्रोणमृत्यवे॥ ११॥
उपयाज कृते तस्मिन् गवां दातास्मि तेऽर्बुदम्।
यद् वा तेऽन्यद् द्विजश्रेष्ठ मनस: सुप्रियं भवेत्।
सर्वं तत् ते प्रदाताहं न हि मेऽत्रास्ति संशय:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उन दोनों की शक्ति को समझकर आलस्य से रहित राजा द्रुपद ने उन्हें समस्त इच्छित भोग देने का संकल्प करके आमंत्रित किया। दोनों में से छोटा उपयाज व्रतों का बहुत अच्छा पालन करने वाला था। द्रुपद ने उससे एकान्त में मिलकर उसकी इच्छानुसार समस्त भोग प्रदान किए और उसे अपने अनुकूल करने का प्रयत्न किया। समस्त इच्छित वस्तुएँ देने का संकल्प लेकर द्रुपद मधुर वचन बोलते हुए ऋषि के चरणों की सेवा करने लगे और उनकी विधिपूर्वक पूजा करके उपयाज से बोले - 'विप्रवर उपयाज! आप वह कर्म कीजिए जिससे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो जो द्रोणाचार्य का वध कर सके। उस कर्म के पूर्ण होने पर मैं आपको एक अर्बुद (दस करोड़) गौएँ दूँगा। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इसके अतिरिक्त जो भी अन्य वस्तु आपके हृदय को सर्वाधिक प्रिय होगी, वह मैं आपको अर्पित करूँगा, इसमें संशय नहीं है।'॥9-12॥
 
Understanding the power of both of them, the king Drupada, free from laziness, invited them with the resolve to offer all the desired pleasures. The younger of the two, Upayaj, was a very good follower of fasts. Drupada met him in private and offered him all the pleasures as per his wish and tried to make him agreeable to himself. Taking the pledge to give all the desired things, Drupada started serving the sage's feet while speaking sweet words and after worshipping him appropriately, said to Upayaj - 'Vipravar Upayaj! Do the deed by which I get such a son who can kill Dronacharya. On completion of that deed, I will give you one Arbuda (10 crore) cows. O best of the Brahmins! Apart from this, whatever other thing will be most dear to your heart, I will offer it to you, there is no doubt in this.'॥ 9-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)