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mahabharat 1.166.40: उनके शरीर की कांति अग्नि की ज्वाला के समान चमक रही थी। उनका रूप भय उत्पन्न करने वाला था। उनके मस्तक पर मुकुट सुशोभित था। उन्होंने शरीर पर उत्तम कवच धारण कर रखा था। वे हाथों में तलवार, बाण और धनुष लिए बार-बार गर्जना कर रहे थे।   |   mahabharat अध्याय 1.166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  1.166.40 
ज्वालावर्णो घोररूप: किरीटी वर्म चोत्तमम्।
बिभ्रत् सखड्ग: सशरो धनुष्मान् विनदन् मुहु:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
उनके शरीर की कांति अग्नि की ज्वाला के समान चमक रही थी। उनका रूप भय उत्पन्न करने वाला था। उनके मस्तक पर मुकुट सुशोभित था। उन्होंने शरीर पर उत्तम कवच धारण कर रखा था। वे हाथों में तलवार, बाण और धनुष लिए बार-बार गर्जना कर रहे थे।
 
The radiance of his body was shining like the flames of fire. His appearance was fear-inducing. A crown was adorned on his forehead. He was wearing a fine armor on his body. He was roaring repeatedly with a sword, arrow and bow in his hands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)