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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति  »  श्लोक 4-6
 
 
श्लोक  1.166.4-6 
प्रभावं विनयं शिक्षां द्रोणस्य चरितानि च।
क्षात्रेण च बलेनास्य चिन्तयन् नाध्यगच्छत॥ ४॥
प्रतिकर्तुं नृपश्रेष्ठो यतमानोऽपि भारत।
अभित: सोऽथ कल्माषीं गङ्गाकूले परिभ्रमन्॥ ५॥
ब्राह्मणावसथं पुण्यमाससाद महीपति:।
तत्र नास्नातक: कश्चिन्न चासीदव्रती द्विज:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय! द्रोणाचार्य से बदला लेने का प्रयत्न करने पर भी श्रेष्ठ द्रुपद उनके प्रभाव, शील, विद्या और चरित्र को देखते हुए भी अपनी सेना की सहायता से उन्हें परास्त करने का कोई उपाय न खोज सके। यमुना और गंगा दोनों तटों पर घूमते हुए वे ब्राह्मणों की एक पवित्र बस्ती में पहुँचे। वहाँ उस महाभाग नरेश को एक भी ऐसा ब्राह्मण दिखाई नहीं दिया, जिसने नियत ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेद-वेदांगों की शिक्षा प्राप्त न की हो। 4-6॥
 
Janamejaya! Even after trying to take revenge from Dronacharya, the best Drupada, considering his influence, modesty, education and character, could not find any way to defeat him with the help of his army. While wandering on the banks of both Yamuna and Ganga, he reached a holy settlement of Brahmins. There, that Mahabhag Naresh did not see even a single Brahmin who had not received the education of Vedas and Vedangas by following the prescribed celibacy. 4-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)