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mahabharat 1.166.29: यद्यपि द्रोणाचार्य में ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों प्रकार का तेज है, तथापि आपका ब्राह्मण तेज उनसे अधिक है। मैं अपने क्षत्रिय बल के कारण ही द्रोणाचार्य से हीन हूँ; अतः मैंने आपके ब्राह्मण तेज की शरण ली है॥ 29॥   |   mahabharat अध्याय 1.166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  1.166.29 
ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्राह्मं तेजो विशिष्यते।
सोऽहं क्षात्राद् बलाद्धीनो ब्राह्मं तेज: प्रपेदिवान्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि द्रोणाचार्य में ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों प्रकार का तेज है, तथापि आपका ब्राह्मण तेज उनसे अधिक है। मैं अपने क्षत्रिय बल के कारण ही द्रोणाचार्य से हीन हूँ; अतः मैंने आपके ब्राह्मण तेज की शरण ली है॥ 29॥
 
‘Although Dronacharya possesses both brahmanic and kshatriya brilliance, your brahmanic brilliance is greater than his. I am inferior to Dronacharya only because of my kshatriya strength; therefore, I have taken refuge in your brahmanic brilliance.॥ 29॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)