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mahabharat 1.166.28: 'घी की आहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान वह प्रचण्ड ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है और युद्ध में जब वह अपने विरोधियों से भिड़ता है, तो अपने क्षत्रिय धर्म का परिचय देते हुए उन्हें भस्म कर देता है॥ 28॥   |   mahabharat अध्याय 1.166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.166.28 
ब्राह्मं संधारयंस्तेजो हुताहुतिरिवानल:।
समेत्य स दहत्याजौ क्षात्रधर्मपुरस्सर:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
'घी की आहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान वह प्रचण्ड ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है और युद्ध में जब वह अपने विरोधियों से भिड़ता है, तो अपने क्षत्रिय धर्म का परिचय देते हुए उन्हें भस्म कर देता है॥ 28॥
 
'Like the fire ignited by the offering of ghee, he acquires tremendous brahminical power and when he encounters his opponents in battle, putting forward his Kshatriya Dharma, he reduces them to ashes.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)