संहिताध्ययनं कुर्वन् वसन् गुरुकुले च य:।
भैक्ष्यमुत्सृष्टमन्येषां भुङ्क्ते स्म च यदा तदा॥ १८॥
कीर्तयन् गुणमन्नानामघृणी च पुन: पुन:।
तं वै फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुषा॥ १९॥
अनुवाद
'गुरुकुल में रहकर संहिताभाग का अध्ययन करते हुए वह समय-समय पर दूसरों द्वारा दी गई भिक्षा खाता था और बिना किसी द्वेष के उस अन्न के गुणों का बार-बार वर्णन करता था। जब मैं तर्क की दृष्टि से अपने भाई को देखता हूँ, तो वह मुझे फलों का लोभी प्रतीत होता है।॥18-19॥
'While staying in the Gurukul and studying the Samhita Bhag, he used to eat the alms given away by others from time to time and without any disgust used to describe the qualities of that food again and again. When I look at my brother from the point of view of logic, he appears to me to be greedy for fruits.॥ 18-19॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥