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mahabharat 1.166.17: ‘जो लोग देखकर भी फल के पापरूपी दोषों को नहीं देखते, जो किसी वस्तु को ग्रहण करते समय उसकी शुद्धता या अशुद्धता का विचार नहीं करते, वे अन्य कार्यों में भी कैसा आचरण करेंगे, यह नहीं कहा जा सकता।॥17॥   |   mahabharat अध्याय 1.166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 166: द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.166.17 
दृष्ट्वा फलस्य नापश्यद् दोषान् पापानुबन्धकान्।
विविनक्ति न शौचं य: सोऽन्यत्रापि कथं भवेत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘जो लोग देखकर भी फल के पापरूपी दोषों को नहीं देखते, जो किसी वस्तु को ग्रहण करते समय उसकी शुद्धता या अशुद्धता का विचार नहीं करते, वे अन्य कार्यों में भी कैसा आचरण करेंगे, यह नहीं कहा जा सकता।॥17॥
 
‘Those who, even after seeing, do not look at the sinful defects of the fruit, those who do not consider the purity or impurity of any object while accepting it, it cannot be said how they will behave in other activities as well.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)