अध्याय 164: पाण्डवोंका एक ब्राह्मणसे विचित्र कथाएँ सुनना
श्लोक 1: जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन् ! बकासुर को इस प्रकार मारकर पुरुषसिंह पाण्डवों ने कौन-सा कार्य किया ? 1॥
श्लोक 2: वैशम्पायनजी बोले - राजन ! बकासुर को मारकर पाण्डव उसी ब्राह्मण के घर में रहकर ब्रह्मतत्त्व का प्रतिपादन करने वाले उपनिषदों का अध्ययन करने लगे ॥2॥
श्लोक 3: तत्पश्चात् कुछ दिनों के पश्चात् एक कठोर नियम पालन करने वाला ब्राह्मण उस ब्राह्मण देवता के घर रहने आया।
श्लोक 4: उस ब्राह्मण का व्रत था कि वह अपने घर आए हुए सभी अतिथियों की सदैव सेवा करेगा। उसने अतिथि ब्राह्मण का खूब पूजन किया और उसे रहने के लिए स्थान दिया ॥4॥
श्लोक 5: वह ब्राह्मण अत्यन्त सुन्दर एवं मंगलमय कथाएँ सुना रहा था; (उसे सुनने के लिए) माता कुन्ती सहित सभी श्रेष्ठ पुरुष पाण्डव उसके पास जाकर बैठ गये।
श्लोक 6: उन्होंने विभिन्न देशों, तीर्थ स्थलों, नदियों, राजाओं और विभिन्न अद्भुत स्थानों और नगरों का वर्णन किया।
श्लोक 7: जनमेजय! वार्तालाप के अंत में ब्राह्मण ने यह भी बताया कि पांचाल देश में यज्ञसेन की पुत्री द्रौपदी का अद्भुत स्वयंवर होने वाला है।
श्लोक 8: उन्होंने धृष्टद्युम्न और शिखण्डी की उत्पत्ति तथा द्रुपद के महायज्ञ में (यज्ञ की वेदी से) बिना माता के कृष्ण (द्रौपदी) का जन्म आदि भी बताया॥8॥
श्लोक 9: कथा के अन्त में उस महात्मा ब्राह्मण के ये वचन सुनकर, जो इस संसार में अत्यन्त अद्भुत प्रतीत होते थे, नरसिंह पाण्डवों ने विस्तारपूर्वक जानने के लिए पूछा॥9॥
श्लोक 10: पाण्डवों ने कहा - द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न का यज्ञकुण्ड से और कृष्ण का यज्ञवेदी के मध्यभाग से अद्भुत जन्म किस प्रकार हुआ? 10॥
श्लोक 11: हे ब्रह्मन्! धृष्टद्युम्न ने महाधनुर्धर द्रोण से समस्त अस्त्र-शस्त्र कैसे सीखे? द्रुपद और द्रोण में मित्रता कैसे हुई? और उनके वैर का कारण क्या था?॥11॥
श्लोक 12: वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! जब पुरुषमुख पाण्डवों ने ऐसा पूछा, तब आगन्तुक ब्राह्मण ने द्रौपदी की उत्पत्ति का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया॥12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥