श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 163: बकासुरके वधसे राक्षसोंका भयभीत होकर पलायन और नगरनिवासियोंकी प्रसन्नता  » 
 
 
अध्याय 163: बकासुरके वधसे राक्षसोंका भयभीत होकर पलायन और नगरनिवासियोंकी प्रसन्नता
 
श्लोक 1:  वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! जब पर्वत के समान विशाल बकासुर की पसलियों की हड्डियाँ भयंकर चीख़ मारकर मर गईं॥1॥
 
श्लोक 2-4:  हे जनमेजय! उस घोष से भयभीत होकर राक्षस परिवार के लोग अपने सेवकों सहित घर से बाहर निकल आए। उन्हें भय से अचेत देखकर योद्धाओं में श्रेष्ठ भीमसेन ने उन्हें सांत्वना दी और यह शर्त मान ली कि 'अब से तुम लोग कभी भी मनुष्यों की हिंसा नहीं करोगे। जो लोग हिंसा करते हैं, वे शीघ्र ही इसी प्रकार मारे जाएँगे।'॥ 2-4॥
 
श्लोक 5:  भीम की यह बात सुनकर राक्षसों ने कहा 'ऐसा ही हो' और शर्त स्वीकार कर ली।
 
श्लोक 6:  तब से नगरवासियों को अपने नगर में रहने वाले राक्षस बहुत ही सौम्य स्वभाव के प्रतीत होने लगे ॥6॥
 
श्लोक 7:  तत्पश्चात् भीमसेन ने उस राक्षस के मृत शरीर को उठाकर नगर के द्वार पर रख दिया और दूसरों की दृष्टि से अपने को बचाते हुए चले गए॥7॥
 
श्लोक 8:  भीमसेन के पराक्रम से बकासुर को मारा गया देखकर राक्षस के परिवार के लोग भयभीत हो गए और इधर-उधर भाग गए।
 
श्लोक 9:  उस राक्षस को मारकर भीमसेन उसी ब्राह्मण के घर गए और वहाँ उन्होंने राजा युधिष्ठिर से सारा वृत्तांत यथावत् कह सुनाया॥9॥
 
श्लोक 10:  फिर जब सुबह हुई और लोग नगर से बाहर आए तो उन्होंने देखा कि बकासुर खून से लथपथ जमीन पर मृत पड़ा है।
 
श्लोक 11:  पर्वत शिखर के समान विशाल उस भयंकर राक्षस को नगर के द्वार पर फेंका हुआ देखकर नगर के नागरिक भयभीत हो गए ॥11॥
 
श्लोक 12-13:  राजा ! उसने एकचक्रा नगर में जाकर यह समाचार सारे नगर में फैला दिया; तब स्त्रियों, बालकों और वृद्धों सहित हजारों लोग बकासुर को देखने के लिए वहाँ आये। उस समय उस अमानवीय कृत्य को देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। जनमेजय ! उन सभी लोगों ने देवताओं की आराधना की। 12-13.
 
श्लोक 14:  इसके बाद उन्होंने दिन आदि की गणना करके यह पता लगाया कि आज भोजन देने की किसकी बारी है। तब उस ब्राह्मण का विवरण जानकर सब लोग उसके पास आए और पूछने लगे॥14॥
 
श्लोक 15:  उनके बार-बार पूछने पर महाबली ब्राह्मण ने पाण्डवों को गुप्त रखते हुए समस्त प्रजाजनों से इस प्रकार कहा -॥15॥
 
श्लोक 16:  ‘कल जब मुझे भोजन कराने का आदेश दिया गया, तब मैं अपने बन्धुओं सहित रो रहा था। ऐसी अवस्था में एक विशाल हृदय वाले तथा मन्त्रज्ञ ब्राह्मण ने मुझे देखा।॥16॥
 
श्लोक 17:  मुझे देखते ही उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने मुझसे सम्पूर्ण नगर के दुःख का कारण पूछा, तत्पश्चात अपनी अलौकिक शक्तियों का आश्वासन देकर मुस्कुराते हुए कहा-॥17॥
 
श्लोक 18:  ‘ब्रह्मन्! आज मैं स्वयं उस दुष्टबुद्धि राक्षस को भोजन कराऊँगा।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘मेरे लिए तुम्हें भय नहीं होना चाहिए।’ ॥18॥
 
श्लोक 19:  वह भोजन सामग्री लेकर बकासुर के वन की ओर चला गया। उसने अवश्य ही लोक-कल्याण के लिए यह कार्य किया होगा।॥19॥
 
श्लोक 20:  तब वे सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आश्चर्यचकित होकर हर्ष में मग्न हो गए। उस समय उन्होंने ब्राह्मणों के सम्मान में एक महान उत्सव मनाया। 20॥
 
श्लोक 21:  इसके बाद उस जनपद में रहने वाले सभी लोग उस अद्भुत घटना को देखने के लिए नगर में आ गए और पाण्डव भी (पहले की भाँति) वहीं रहने लगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)