श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 161: भीमसेनको राक्षसके पास भेजनेके विषयमें युधिष्ठिर और कुन्तीकी बातचीत  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.161.21 
अर्थौ द्वावपि निष्पन्नौ युधिष्ठिर भविष्यत:।
प्रतीकारश्च वासस्य धर्मश्च चरितो महान्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! मेरे इस निश्चय से दोनों प्रयोजन सिद्ध होंगे। प्रथम तो ब्राह्मण के यहाँ निवास करने का ऋण चुक जाएगा और दूसरा लाभ यह होगा कि ब्राह्मणों और स्वदेशवासियों की रक्षा होने से उत्तम धर्म का पालन हो सकेगा। 21॥
 
Yudhisthira! With this determination of mine, both purposes will be accomplished. Firstly, the debt of living at a Brahmin's place will be repaid and the second benefit is that due to the protection of Brahmins and the natives, the great religion will be followed. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)