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mahabharat 1.160.11-12: आपत्तिकाल के सिद्धान्त को जानने वाले प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि मनुष्य को कोई क्रूर या निन्दनीय कार्य नहीं करना चाहिए। अतः अच्छा है कि मैं आज ही अपनी पत्नी सहित मर जाऊँ; किन्तु मैं ब्राह्मण-हत्या की अनुमति कभी नहीं दे सकता। ॥11-12॥   |   mahabharat अध्याय 1.160: कुन्ती और ब्राह्मणकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 160: कुन्ती और ब्राह्मणकी बातचीत  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  1.160.11-12 
कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन।
इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदु:॥ ११॥
श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मम स्वयम्।
ब्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कदाचन॥ १२॥
 
 
अनुवाद
आपत्तिकाल के सिद्धान्त को जानने वाले प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि मनुष्य को कोई क्रूर या निन्दनीय कार्य नहीं करना चाहिए। अतः अच्छा है कि मैं आज ही अपनी पत्नी सहित मर जाऊँ; किन्तु मैं ब्राह्मण-हत्या की अनुमति कभी नहीं दे सकता। ॥11-12॥
 
The ancient sages who are well versed with the principles of emergency have said that one should not commit any cruel or condemnable act. Therefore, it is better that I perish along with my wife today; but I can never give permission for the killing of a Brahmin. ॥11-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)