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श्लोक 1.16.4  |
सौतिरुवाच
आयुष्मन्निदमाख्यानमास्तीकं कथयामि ते।
यथाश्रुतं कथयत: सकाशाद् वै पितुर्मया॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| उग्रश्रवाजी बोले- आयुष्मान्! मैं तुमसे यह आस्तिक कथा उसी रूप में कहता हूँ, जिस रूप में मैंने इसे अपने कथावाचक पिता से सुना है॥4॥ |
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| Ugrashravaji said- Ayushman! I tell you this story of Aastik to you in the same form as I have heard it from my narrator father. 4॥ |
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