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mahabharat 1.158.12: 'पिताजी! आपके बिना मैं सदैव दुःखी, असहाय, अनाथ और दयनीय रहूँगी। असुरक्षित कन्या होने के कारण मुझे जहाँ चाहूँ वहाँ जाने को विवश होना पड़ेगा।॥12॥   |   mahabharat अध्याय 1.158: ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 158: ब्राह्मण-कन्याके त्याग और विवेकपूर्ण वचन तथा कुन्तीका उन सबके पास जाना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.158.12 
अनाथा कृपणा बाला यत्रक्वचनगामिनी।
भविष्यामि त्वया तात विहीना कृपणा सदा॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! आपके बिना मैं सदैव दुःखी, असहाय, अनाथ और दयनीय रहूँगी। असुरक्षित कन्या होने के कारण मुझे जहाँ चाहूँ वहाँ जाने को विवश होना पड़ेगा।॥12॥
 
‘Father! Without you I will forever be miserable and helpless, orphaned and pitiful. Being an unprotected girl I will be forced to go wherever I want.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)