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mahabharat 1.157.5: पति के कल्याण के लिए प्राण त्यागने का यह कार्य न केवल आपको सुखदायी होगा, अपितु इससे मुझे परलोक में चिर सुख और इस लोक में यश की प्राप्ति होगी ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.157.5 
तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम्।
भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पति के कल्याण के लिए प्राण त्यागने का यह कार्य न केवल आपको सुखदायी होगा, अपितु इससे मुझे परलोक में चिर सुख और इस लोक में यश की प्राप्ति होगी ॥5॥
 
This act of sacrificing my life for the welfare of my husband will not only be pleasurable to you but will also provide me with everlasting happiness in the next world and fame in this world. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)