वैशम्पायनजी कहते हैं - भरत! उस ब्राह्मणी की यह बात सुनकर उसके पति ब्राह्मणदेव अत्यन्त दुःखी हो गये और उसे गले लगाकर उसके साथ आँसू बहाने लगे।
Vaishmpayana says: Bhaarat! On hearing the Brahmin lady say this, her husband, the Brahmin God, became very sad and embraced her and started shedding tears along with her.
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणीवाक्ये सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणीवाक्यविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५७॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३९ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥