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mahabharat 1.157.27: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने धन की रक्षा किसी भी विपत्ति से करे, धन से अपनी स्त्री की रक्षा करे, तथा अपनी स्त्री और धन दोनों से सदैव अपनी रक्षा करे। 27.   |   mahabharat अध्याय 1.157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.157.27 
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥ २७॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने धन की रक्षा किसी भी विपत्ति से करे, धन से अपनी स्त्री की रक्षा करे, तथा अपनी स्त्री और धन दोनों से सदैव अपनी रक्षा करे। 27.
 
One should protect his wealth against any calamity, protect his wife with his wealth, and always protect himself with both his wife and money. 27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)