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mahabharat 1.157.2: एक न एक दिन इस संसार में सभी मनुष्यों को मरना ही है; इसलिए जो होना ही है, उसके लिए शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥2॥   |   mahabharat अध्याय 1.157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.157.2 
अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवै:।
अवश्यम्भाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते॥ २॥
 
 
अनुवाद
एक न एक दिन इस संसार में सभी मनुष्यों को मरना ही है; इसलिए जो होना ही है, उसके लिए शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥2॥
 
One day or the other all human beings in this world will have to die; therefore there is no need to mourn for something that is bound to happen. ॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)