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mahabharat 1.157.18-19: ब्रह्मन्! आपके इस पुत्र को आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्री को भी कुपात्र के वश में पड़कर, संसार में अभिमानी लोगों द्वारा अपमानित होते देखकर तथा अपने को पहले जैसी सम्मानजनक स्थिति में न पाकर मैं अपने प्राण त्याग दूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। 18-19॥   |   mahabharat अध्याय 1.157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  1.157.18-19 
सम्प्रेक्षमाणा पुत्रं ते नानुरूपमिवात्मन:।
अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव॥ १८॥
अवज्ञाता च लोकेषु तथाऽऽत्मानमजानती।
अवलिप्तैर्नरैर्ब्रह्मन् मरिष्यामि न संशय:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्मन्! आपके इस पुत्र को आपके अनुरूप न देखकर और आपकी इस पुत्री को भी कुपात्र के वश में पड़कर, संसार में अभिमानी लोगों द्वारा अपमानित होते देखकर तथा अपने को पहले जैसी सम्मानजनक स्थिति में न पाकर मैं अपने प्राण त्याग दूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। 18-19॥
 
Brahman! There is no doubt that I will sacrifice my life after seeing this son of yours not being in accordance with you and this daughter of yours also falling under the control of an unworthy man and being insulted by arrogant people in the world and not finding myself in the same respectable state as before. 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)