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mahabharat 1.157.15: आप धर्म के ज्ञाता हैं। जिस प्रकार आप अपने पुत्र को गुणवान बना सकते हैं, उसी प्रकार आपकी अनुपस्थिति में मैं इस अनाथ बालक में, जो सब ओर से आश्रयहीन है, वांछित सद्गुण कैसे उत्पन्न कर सकूँगा ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 1.157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 157: ब्राह्मणीका स्वयं मरनेके लिये उद्यत होकर पतिसे जीवित रहनेके लिये अनुरोध करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.157.15 
कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन् गुणानाधातुमीप्सितान्।
अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
आप धर्म के ज्ञाता हैं। जिस प्रकार आप अपने पुत्र को गुणवान बना सकते हैं, उसी प्रकार आपकी अनुपस्थिति में मैं इस अनाथ बालक में, जो सब ओर से आश्रयहीन है, वांछित सद्गुण कैसे उत्पन्न कर सकूँगा ॥15॥
 
You are the knower of Dharma. Just as you can make your own son virtuous, similarly, in your absence, how will I be able to instill the desirable good qualities in this orphan child who is bereft of shelter from all sides. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)