Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.156.41: अहा! मैं अत्यन्त कठिन समस्या में फँस गया हूँ। मुझमें उससे पार पाने की शक्ति नहीं है। धिक्कार है इस जीवन को। हाय! आज मैं अपने मित्रों और सम्बन्धियों सहित किस गति को प्राप्त होऊँगा? सबके साथ मर जाना ही अच्छा है। मेरा जीवित रहना बिल्कुल भी उचित नहीं है॥ 41॥ | mahabharat अध्याय 1.156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्गार । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स कृच्छ्रामहमापन्नो न शक्तस्तर्तुमापदम्।
अहो धिक् कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सबान्धव:।
सर्वै: सह मृतं श्रेयो न च मे जीवितं क्षमम्॥ ४१॥
अनुवाद
अहा! मैं अत्यन्त कठिन समस्या में फँस गया हूँ। मुझमें उससे पार पाने की शक्ति नहीं है। धिक्कार है इस जीवन को। हाय! आज मैं अपने मित्रों और सम्बन्धियों सहित किस गति को प्राप्त होऊँगा? सबके साथ मर जाना ही अच्छा है। मेरा जीवित रहना बिल्कुल भी उचित नहीं है॥ 41॥
Oh! I am trapped in a very difficult problem. I do not have the strength to overcome it. Shame on this life. Alas! What fate will I attain today along with my friends and relatives? It is better to die along with everyone. It is not at all appropriate for me to remain alive.॥ 41॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणचिन्तायां षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी चिन्ताविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५६॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/२ श्लोक हैं)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥