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mahabharat 1.156.38: जिस पर पुण्य, वंश और शाश्वत सुख का संसार निर्भर है, उस निर्दोष बालिका को मैं कैसे त्याग सकता हूँ? ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 1.156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  1.156.38 
यस्यां लोका: प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम्।
अपापां तामहं बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जिस पर पुण्य, वंश और शाश्वत सुख का संसार निर्भर है, उस निर्दोष बालिका को मैं कैसे त्याग सकता हूँ? ॥38॥
 
How can I abandon that innocent girl on whom the world of virtue, lineage and eternal happiness all depend? ॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)