श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 33-36
 
 
श्लोक  1.156.33-36 
कुलीनां शीलसम्पन्नामपत्यजननीमपि।
त्वामहं जीवितस्यार्थे साध्वीमनपकारिणीम्॥ ३३॥
परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भार्यां नित्यमनुव्रताम्।
कुत एव परित्यक्तुं सुतं शक्ष्याम्यहं स्वयम्॥ ३४॥
बालमप्राप्तवयसमजातव्यञ्जनाकृतिम् ।
भर्तुरर्थाय निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना॥ ३५॥
यया दौहित्रजाँल्लोकानाशंसे पितृभि: सह।
स्वयमुत्पाद्य तां बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
तुम कुलीन, गुणवती, सन्तानयुक्त और पतिव्रता हो। तुमने कभी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा। तुम मेरी पतिव्रता पत्नी हो। इसलिए मैं अपने प्राण बचाने के लिए तुम्हें त्याग नहीं सकता। फिर मैं अपने उस पुत्र को कैसे त्याग सकता हूँ, जो अभी बालक है, जिसने युवावस्था में प्रवेश नहीं किया है और जिसके शरीर में अभी तक यौवन के लक्षण भी नहीं दिखाई दिए हैं। और अपनी इस पुत्री को, जिसे ब्रह्माजी ने उसके भावी पति के लिए मेरे पास रख छोड़ा है, मैं कैसे त्याग सकता हूँ? जिसके जन्म से मैं अपने पूर्वजों के साथ पौत्रों के पुण्यलोकों को प्राप्त करने की आशा करता हूँ, उसी कन्या को मैं स्वयं कैसे जन्म देकर मृत्यु के मुख में छोड़ सकता हूँ?॥33-36॥
 
You are of noble family, virtuous woman, blessed with children, and chaste. You have never done me any harm. You are my faithful wife. Therefore, I cannot abandon you to save my life. Then how can I abandon my own son, who is still a child, who has not entered his youth and whose body has not yet shown the signs of youth. Also, how can I abandon this daughter of mine, whom the great Brahmaji has kept with me as a deposit for her future husband? With whose birth I hope to attain the virtuous worlds of grandsons along with my ancestors, how can I give birth to that very girl child myself and leave her to the mouth of death?॥33-36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)