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mahabharat 1.156.30: अन्यथा यह मेरा ही विनाश का समय है; क्योंकि मैं स्वयं अपने जीते जी क्रूर पुरुष की भाँति अपने भाई या सम्बन्धी को त्याग नहीं सकूँगा ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 1.156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.156.30 
अथवा मद्विनाशोऽयं न हि शक्ष्यामि कंचन।
परित्यक्तुमहं बन्धुं स्वयं जीवन् नृशंसवत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
अन्यथा यह मेरा ही विनाश का समय है; क्योंकि मैं स्वयं अपने जीते जी क्रूर पुरुष की भाँति अपने भाई या सम्बन्धी को त्याग नहीं सकूँगा ॥30॥
 
Or else this is the time of my own destruction; because I myself will not be able to abandon my brother or relative like a cruel man while I am alive. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)