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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.156.25 
न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येयमापद:।
पुत्रदारेण वा सार्धं प्राद्रवेयमनामयम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मुझे ऐसा कोई रास्ता नहीं दिख रहा है जिससे मैं इस विपत्ति से बच सकूं या अपने बेटे और पत्नी के साथ किसी सुरक्षित स्थान पर जा सकूं।
 
I cannot see any way by which I can escape from this calamity or escape to some safe place with my son and wife.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)