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mahabharat 1.156.24: धन की इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, परन्तु उसे प्राप्त करने में उससे भी बड़ा दुःख है। और जब धन में आसक्त होकर मनुष्य उससे विमुख हो जाता है, तब उसे ऐसा महान दुःख होता है जिसकी कोई सीमा नहीं होती ॥24॥   |   mahabharat अध्याय 1.156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  1.156.24 
अर्थेप्सुता परं दु:खमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम्।
जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रयोगे महत्तरम्॥ २४॥
 
 
अनुवाद
धन की इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, परन्तु उसे प्राप्त करने में उससे भी बड़ा दुःख है। और जब धन में आसक्त होकर मनुष्य उससे विमुख हो जाता है, तब उसे ऐसा महान दुःख होता है जिसकी कोई सीमा नहीं होती ॥24॥
 
The desire for wealth is the greatest sorrow, but there is even greater sorrow in obtaining it. And when a person has become attached to wealth is separated from it, he experiences such great sorrow that there is no limit to it. ॥24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)