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mahabharat 1.156.22: जीवात्मा धर्म, अर्थ और काम का ही भोग करता है। इनका वियोग भी उसके लिए महान् एवं अनंत दुःख का कारण बनता है ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 1.156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 156: ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्‍गार  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  1.156.22 
आत्मा ह्येको हि धर्मार्थौ कामं चैव निषेवते।
एतैश्च विप्रयोगोऽपि दु:खं परमनन्तकम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जीवात्मा धर्म, अर्थ और काम का ही भोग करता है। इनका वियोग भी उसके लिए महान् एवं अनंत दुःख का कारण बनता है ॥22॥
 
The soul enjoys Dharma, Artha and Kama alone. Separation from these also causes great and infinite sorrow for him. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)