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mahabharat 1.155.9: इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे लिए तुम और धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन आदि सब एक समान हैं। परंतु लोग दरिद्र और छोटे लोगों को अधिक प्रेम करते हैं; इसीलिए इस समय मैं तुमसे अधिक प्रेम करता हूँ॥9॥   |   mahabharat अध्याय 1.155: पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 155: पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.155.9 
समास्ते चैव मे सर्वे यूयं चैव न संशय:।
दीनतो बालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति मानवा:।
तस्मादभ्यधिक: स्नेहो युष्मासु मम साम्प्रतम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे लिए तुम और धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन आदि सब एक समान हैं। परंतु लोग दरिद्र और छोटे लोगों को अधिक प्रेम करते हैं; इसीलिए इस समय मैं तुमसे अधिक प्रेम करता हूँ॥9॥
 
There is no doubt that for me you and Dhritarashtra's son Duryodhan and others are all the same. But people love those who are poor and young; that is why I love you more at this time.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)