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mahabharat 1.155.3-4: उन सबके सिरों पर जटाएँ थीं। उन्होंने अपने शरीर पर छाल और मृगचर्म ओढ़ रखा था और तपस्वियों का वेश धारण कर रखा था। इस प्रकार पाण्डवों के महारथी अपनी माता कुन्तीदेवी को लेकर कभी उन्हें पीठ पर लादकर, कभी इच्छानुसार धीरे-धीरे और कभी पुनः तीव्र गति से चलते थे।॥3-4॥   |   mahabharat अध्याय 1.155: पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 155: पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  1.155.3-4 
जटा: कृत्वाऽऽत्मन: सर्वे वल्कलाजिनवासस:।
सह कुन्त्या महात्मानो बिभ्रतस्तापसं वपु:॥ ३॥
क्वचिद् वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथा:।
क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मु: प्रसभं पुन:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
उन सबके सिरों पर जटाएँ थीं। उन्होंने अपने शरीर पर छाल और मृगचर्म ओढ़ रखा था और तपस्वियों का वेश धारण कर रखा था। इस प्रकार पाण्डवों के महारथी अपनी माता कुन्तीदेवी को लेकर कभी उन्हें पीठ पर लादकर, कभी इच्छानुसार धीरे-धीरे और कभी पुनः तीव्र गति से चलते थे।॥3-4॥
 
All of them had matted locks on their heads. They had covered their bodies with bark and deerskin and had donned the garb of ascetics. In this manner, the great warriors of the Pandavas would walk at a fast pace with their mother Kuntidevi, sometimes carrying her on their backs, sometimes walking slowly as per their wish and sometimes speeding up their pace again.॥ 3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)