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mahabharat 1.154.d29-d34: कुन्ती बोली—राजन्! जिस प्रकार राजा पाण्डु आपके लिए आदरणीय थे, उसी प्रकार आपके बड़े भाई युधिष्ठिर भी हैं। धर्म शास्त्रों की दृष्टि से मैं उनसे अधिक मर्यादित एवं आदरणीय हूँ। अतः राजा पाण्डु के हित के लिए आप मेरी एक हितकारी आज्ञा का पालन करें। वृकोदर! पापात्मा दुर्योधन ने जो दुष्टता से हमारे साथ अपवित्र व्यवहार किया है, उसका बदला लेने का मुझे कोई उपाय नहीं दिखाई देता। अतः यदि कुछ दिनों बाद हमारा कल्याण हो भी जाए, तो भी यह निवास स्थान हमारे लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा, क्योंकि यहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है। हम यहाँ सुखपूर्वक रहेंगे। हे बुद्धिमान भीमसेन! आज हमारे सामने एक अत्यन्त दुःखद एवं नैतिक दुविधा है कि हिडिम्बा आपको देखकर काम से प्रेरित होकर मेरे और युधिष्ठिर के पास आई और धर्मानुसार आपको पति रूप में स्वीकार कर लिया। मेरी आज्ञा है कि आप उसे धर्म के लिए एक पुत्र दें। वह हमारा हित करने वाला होगा। मैं इस विषय में आपसे कोई तर्क नहीं सुनना चाहती। आप हम दोनों के समक्ष प्रतिज्ञा करें।   |   mahabharat अध्याय 1.154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति  »  श्लोक d29-d34
 
 
श्लोक  1.154.d29-d34 
कुन्त्युवाच
यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिर:।
अहं धर्मविधानेन मान्या गुरुतरा तव॥
तस्मात् पाण्डुहितार्थं मे युवराज हितं कुरु।
निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना।
दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर॥
तस्मात् कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति॥
क्षेमं दुर्गमिमं वासं वसिष्यामो यथासुखम्।
इदमद्य महद् दु:खं धर्मकृच्छ्रं वृकोदर॥
दृष्ट्वैव त्वां महाप्राज्ञ अनङ्गाभिप्रचोदिता।
युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मत:॥
धर्मार्थं देहि पुत्रं त्वं स न: श्रेय: करिष्यति।
प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि ह्यावाभ्यां वचनं कुरु॥ )
 
 
अनुवाद
कुन्ती बोली—राजन्! जिस प्रकार राजा पाण्डु आपके लिए आदरणीय थे, उसी प्रकार आपके बड़े भाई युधिष्ठिर भी हैं। धर्म शास्त्रों की दृष्टि से मैं उनसे अधिक मर्यादित एवं आदरणीय हूँ। अतः राजा पाण्डु के हित के लिए आप मेरी एक हितकारी आज्ञा का पालन करें। वृकोदर! पापात्मा दुर्योधन ने जो दुष्टता से हमारे साथ अपवित्र व्यवहार किया है, उसका बदला लेने का मुझे कोई उपाय नहीं दिखाई देता। अतः यदि कुछ दिनों बाद हमारा कल्याण हो भी जाए, तो भी यह निवास स्थान हमारे लिए कल्याणकारी सिद्ध होगा, क्योंकि यहाँ पहुँचना अत्यन्त कठिन है। हम यहाँ सुखपूर्वक रहेंगे। हे बुद्धिमान भीमसेन! आज हमारे सामने एक अत्यन्त दुःखद एवं नैतिक दुविधा है कि हिडिम्बा आपको देखकर काम से प्रेरित होकर मेरे और युधिष्ठिर के पास आई और धर्मानुसार आपको पति रूप में स्वीकार कर लिया। मेरी आज्ञा है कि आप उसे धर्म के लिए एक पुत्र दें। वह हमारा हित करने वाला होगा। मैं इस विषय में आपसे कोई तर्क नहीं सुनना चाहती। आप हम दोनों के समक्ष प्रतिज्ञा करें।
 
Kunti said— Prince! Just as King Pandu was respected for you, so is your elder brother Yudhishthira. From the viewpoint of religious scriptures, I am more dignified and respectable than him. Therefore, for the benefit of King Pandu, you should obey my one beneficial command. Vrikodara! I do not see any way to take revenge for the evil done to us by the sinful soul Duryodhan with impure mind. Therefore, even if our welfare is achieved after some days, this place of residence will prove beneficial for us as it is very difficult to reach. We will live here happily. O wise Bhimasena! Today, we are faced with a very sad and moral dilemma that Hidimba, on seeing you, was inspired by lust and came to me and Yudhishthira and accepted you as her husband as per Dharma. My command is that you should give her a son for Dharma. He will be beneficial for us. I do not want to hear any argument from you in this matter. You take a vow in front of both of us.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)