Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.154.d21-d28: युधिष्ठिर की यह बात सुनकर कुंती ने हिडिम्बा को गले लगा लिया। तत्पश्चात वह भीम के साथ युधिष्ठिर से कुछ दूरी बनाकर चलने लगी। चलते समय वह भीम और अर्जुन के बीच में रहती थी। नकुल और सहदेव सदैव उसके आगे-आगे चलते थे। (इस प्रकार) वे सभी जल पीने की इच्छा से शालिहोत्र ऋषि के सुंदर सरोवर के तट पर पहुँचे। वहाँ हिडिम्बा राक्षसी ने कुंती और युधिष्ठिर द्वारा पूर्व में रखी गई शर्त को स्वीकार करके वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात वह वृक्ष के नीचे गई और उस स्थान को घर के समान झाड़कर पांडवों के रहने के लिए स्थान बनाया। उन सबके लिए एक कुटिया तैयार करने के बाद, उसने अपने और कुंती के लिए एक अन्य स्थान पर कुटिया बनाई। तत्पश्चात पांडवों ने स्नान करके स्वयं को शुद्ध किया और संध्याओपासना की तथा भूख-प्यास होने पर भी केवल जल ग्रहण किया। उस समय उन्हें भूखा जानकर शालिहोत्र ऋषि ने उनके लिए प्रचुर भोजन-जल का विचार किया (और उसी से पांडवों को भोजन कराया)। तत्पश्चात, कुंतीदेवी सहित सभी पांडव विश्राम करने लगे। विश्राम के दौरान वे तरह-तरह की बातें करने लगे – कैसे उन्हें लाक्षागृह में जलाने का प्रयास किया गया और फिर राक्षसी हिडिम्बा ने उन पर आक्रमण किया, आदि। बातचीत समाप्त होने के बाद, राजकुमारी कुंती ने पांडवपुत्र भीमसेन से यह बात कही। | mahabharat अध्याय 1.154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
युधिष्ठिर की यह बात सुनकर कुंती ने हिडिम्बा को गले लगा लिया। तत्पश्चात वह भीम के साथ युधिष्ठिर से कुछ दूरी बनाकर चलने लगी। चलते समय वह भीम और अर्जुन के बीच में रहती थी। नकुल और सहदेव सदैव उसके आगे-आगे चलते थे। (इस प्रकार) वे सभी जल पीने की इच्छा से शालिहोत्र ऋषि के सुंदर सरोवर के तट पर पहुँचे। वहाँ हिडिम्बा राक्षसी ने कुंती और युधिष्ठिर द्वारा पूर्व में रखी गई शर्त को स्वीकार करके वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात वह वृक्ष के नीचे गई और उस स्थान को घर के समान झाड़कर पांडवों के रहने के लिए स्थान बनाया। उन सबके लिए एक कुटिया तैयार करने के बाद, उसने अपने और कुंती के लिए एक अन्य स्थान पर कुटिया बनाई। तत्पश्चात पांडवों ने स्नान करके स्वयं को शुद्ध किया और संध्याओपासना की तथा भूख-प्यास होने पर भी केवल जल ग्रहण किया। उस समय उन्हें भूखा जानकर शालिहोत्र ऋषि ने उनके लिए प्रचुर भोजन-जल का विचार किया (और उसी से पांडवों को भोजन कराया)। तत्पश्चात, कुंतीदेवी सहित सभी पांडव विश्राम करने लगे। विश्राम के दौरान वे तरह-तरह की बातें करने लगे – कैसे उन्हें लाक्षागृह में जलाने का प्रयास किया गया और फिर राक्षसी हिडिम्बा ने उन पर आक्रमण किया, आदि। बातचीत समाप्त होने के बाद, राजकुमारी कुंती ने पांडवपुत्र भीमसेन से यह बात कही।
On hearing Yudhishthira say this, Kunti embraced Hidimba. Thereafter she started walking with Bhima, keeping some distance from Yudhishthira. While walking she used to stay between Bhima and Arjuna. Nakula and Sahadeva always used to walk ahead of her. (Thus) they (all) reached the bank of the beautiful lake of sage Shalihotra with the desire to drink water. There Hidimba demoness took the pledge to do the same thing after accepting the condition laid down by Kunti and Yudhishthira earlier. Thereafter she went under the tree and swept the place like a house and made a place to live for the Pandavas. After preparing a hut for all of them, she made a hut for herself and Kunti at another place. Thereafter the Pandavas purified themselves by taking a bath and performed Sandhyaopasana and despite being hungry and thirsty, ate only water. At that time, knowing that they were hungry, sage Shalihotra thought of abundant food and drink for them (and fed the Pandavas with that). Thereafter, all the Pandavas including Kuntidevi started resting. During the rest, they started talking about various things – how an attempt was made to burn them in the Lakhshagriha and then how the demon Hidimba attacked them, etc. were the topics of their discussion. After the conversation was over, Kunti's princess Kunti said this to Pandava's son Bhimasena.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥