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श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 154: युधिष्ठिरका भीमसेनको हिडिम्बाके वधसे रोकना, हिडिम्बाकी भीमसेनके लिये प्रार्थना, भीमसेन और हिडिम्बाका मिलन तथा घटोत्कचकी उत्पत्ति  »  श्लोक d1-d2
 
 
श्लोक  1.154.d1-d2 
(वैशम्पायन उवाच
सा तानेवापतत् तूर्णं भगिनी तस्य रक्षस:।
अब्रुवाणा हिडिम्बा तु राक्षसी पाण्डवान् प्रति॥
अभिवाद्य तत: कुन्तीं धर्मराजं च पाण्डवम्।
अभिपूज्य च तान् सर्वान् भीमसेनमभाषत॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! हिडिम्बासुर की बहन राक्षसी हिडिम्बा बिना कुछ कहे तुरन्त ही पाण्डवों के पास आई और माता कुन्ती तथा पाण्डवपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को प्रणाम करके भीमसेन से बोली।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Hidimbasur's sister, the demoness Hidimba, without saying anything, immediately came to the Pandavas and after paying her respects to mother Kunti and Pandava's son Dharmaraja Yudhishthira, spoke to Bhimasena.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)